‘इक्कीस’ की कहानी दो अलग-अलग समय और भावनाओं को जोड़ती है। ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल (धर्मेंद्र) बंटवारे से पहले पाकिस्तान के सरगोधा में रहते थे। सालों बाद वे लाहौर जाते हैं—पुराने दोस्तों से मिलने और अपनी जड़ों को महसूस करने। लेकिन उनका असली मकसद कुछ और है।
वे यह समझना चाहते हैं कि 1971 के युद्ध में उनके 21 साल के बेटे, 2nd लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) ने अपना टैंक छोड़कर जान बचाने के आदेश को क्यों ठुकरा दिया था? कहानी में दर्दनाक मोड़ तब आता है जब पाकिस्तान में उनकी मेजबानी ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार (जयदीप अहलावत) करते हैं, वही सैन्य अधिकारी जिनकी वजह से अरुण शहीद हुए थे।
क्या खास है (What Works)
- संजीदा निर्देशन: श्रीराम राघवन ने इसे एक पारंपरिक युद्ध फिल्म बनाने के बजाय मानवीय दृष्टिकोण दिया है। फिल्म में भारी-भरकम डायलॉगबाजी नहीं, बल्कि गहरी संवेदनाएं हैं।
- धर्मेंद्र का जादू: 89 साल की उम्र में धर्मेंद्र जी ने अपनी आंखों और खामोशी से जो अभिनय किया है, वह दिल को छू लेता है। यह उनके करियर की आखिरी फिल्म के तौर पर एक बेहद सम्मानित विदाई है।
- यथार्थवादी युद्ध दृश्य: हिंदी सिनेमा में टैंक वॉर (Tank Battle) को इतनी बारीकी और सादगी से कम ही दिखाया गया है। CGI का इस्तेमाल कहानी को सहारा देने के लिए किया गया है, न कि उसे दबाने के लिए।
- NDA बॉल सीक्वेंस: फिल्म का यह हिस्सा युवा अधिकारियों की मासूमियत और उनके सुनहरे भविष्य के सपनों को बखूबी दिखाता है।
कहाँ कमी रह गई (What Doesn’t Work)
- धीमी रफ्तार: फिल्म की पेसिंग (Pacing) कहीं-कहीं काफी धीमी हो जाती है, जो शायद हर तरह के दर्शक को पसंद न आए।
- कमजोर सब-प्लॉट: फिल्म में एक समानांतर कहानी चलती है जो मुख्य प्लॉट के प्रवाह को थोड़ा बाधित करती है।
- संगीत: ‘सजदा’ को छोड़कर बाकी गाने औसत हैं और फिल्म खत्म होने के बाद याद नहीं रहते।
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कलाकारों का प्रदर्शन (Performances)
- अगस्त्य नंदा: अपनी पिछली फिल्म ‘द आर्चीज’ के मुकाबले अगस्त्य ने जबरदस्त सुधार दिखाया है। अरुण खेत्रपाल के किरदार में उनकी ईमानदारी दिखती है, हालांकि एक फौजी की ‘बॉडी लैंग्वेज’ में वे थोड़ा और सख्त हो सकते थे।
- जयदीप अहलावत: जयदीप हमेशा की तरह अपने किरदार में जान फूंक देते हैं। एक अपराधी बोध (Guilt) से दबे पाकिस्तानी अफसर के रूप में उनका संयमित अभिनय काबिल-ए-तारीफ है।
- विवान शाह और अन्य: विवान शाह, सिकंदर खेर और राहुल बोस ने छोटे लेकिन प्रभावी किरदारों में अपनी छाप छोड़ी है। सिमर भाटिया ने किरण के रूप में कहानी में मिठास भरी है।
अंतिम फैसला (Final Verdict)
रेटिंग: 3/5
‘इक्कीस’ उन लोगों के लिए है जो सिनेमा में गहराई और ठहराव पसंद करते हैं। अगर आप ‘गदर’ या ‘बॉर्डर’ जैसी लाउड वॉर फिल्मों की तलाश में हैं, तो शायद यह आपको निराश करे। लेकिन अगर आप धर्मेंद्र जी को एक आखिरी बार बड़े पर्दे पर सम्मान देना चाहते हैं और एक वीर शहीद की अनकही कहानी जानना चाहते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखें।



